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हरि रूठे गुरू ठौर है, गुरू रूठे नहीं ठौर"

"हरि रूठे गुरू ठौर है, गुरू रूठे नहीं ठौर"

पावस की पावन बूंदों से पतझड़ खिलता है।
मेह स्नेह बन गुरू आये तो जीवन मिलता है।

विकट निशा में नर भला कब तक चल पाएगा।
पूर्ण अवतरित चंद्र ही तब पार लगाएगा।
निक्षेपित ये पुष्पबीज कभी खिल ही जाएंगे।
हर प्रसून को माली से जब सिंचन मिलता है।
मेह स्नेह बन गुरू आये तो जीवन मिलता है।
पावस की पावन बूंदों से पतझड़ खिलता है।

तमस्वती सी निशा में फंस जाओगे ओ प्राणी!
पारण के कुछ मंत्र सीख लो सुनकर गुरु-वाणी
पुण्यवान बन नत हो जाओ उनके दर्शन पर
बालमना सा बनकर जो धरती पर मिलता है।
मेह स्नेह बन गुरू आये तो जीवन मिलता है।
पावस की पावन बूंदों से  पतझड़ खिलता है।

मसि बहुत थी पर कलम को अक्षर नहीं मिले
शब्दों को कुछ ढाला भी तो स्वर नहीं मिले,
प्राण-प्रतिष्ठा तब होती है जब हो गुरु संगम
झंकृत होकर हृदय का तब तार हिलता है।
मेह स्नेह बन गुरू आये तो जीवन मिलता है।
पावस की पावन बूंदों से पतझड़ खिलता है।

ध्रुव तारे से लक्षण हर तारे में नहीं होते
अटल सत्य के दर्शन भी कभी सुलभ नहीं होते
त्राहि त्राहि कर दुविधा से जग में मत भटको
सत्वगुणी वो अमरपुरुष तत्पर ही मिलता है।
मेह स्नेह बन गुरू आये तो जीवन मिलता है।
पावस की पावन बूंदों से पतझड़ खिलता है।

कभी मिलेगा अश्रुरूप में वो निर्मल पानी
कभी मिलेगा अमरकोश में वो दानी ज्ञानी
अवनत होकर सेव्यभाव से पाना सम्भव है,
माणिक ऐसे अनायास ही किसको मिलता है?
मेह स्नेह बन गुरू आये तो जीवन मिलता है।
पावस की पावन बूंदों से पतझड़ खिलता है।



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